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Friday, August 17, 2012

सबसे बड़ा धन

एक बूढ़ा संगीतकार किसी जंगल से गुजर रहा था। उसके पास बहुत सी स्वर्ण मुद्राएं थीं। रास्ते में कई डाकुओं ने उसे पकड़ लिया। उन्होंने उसका सारा धन तो छीन ही लिया साथ ही वाइलिन भी। वह अपने संगीत से व उस वाइलिन से बहुत प्यार करता था। संगीतकार ने डाकुओं से बड़ी ही नम्रता से अपना वाइलिन मांगा। वे डाकू बड़े चकित हुए। उन्होंने सोचा कैसा पागल आदमी है। धन वापस ना मांगकर ये बाजा मांग रहा है। डाकुओं ने सोचा कि यह बाजा हमारे किस काम का और उसे वापस लौटा दिया।
वह संगीतकार उसे पाकर नाचने लगा और उसे वहीं बैठकर बजाने लगा। अमावस्या की अंधेरी रात सुनसान वन ऐसे वाइलिन का मीठा स्वर शुरू में तो डाकु अनमने मन से सुनते रहे फिर उनकी आंखों मे भी नमी आ गई। वे भाव विभोर हो उठे और उन्होंने न सिर्फ उसका सारा धन लौटा दिया बल्कि उसे वन के बाहर तक सुरक्षित भी पंहुचाया ।
लाइफ का फंडासंगीत उस संगीतकार का मूल स्वभाव भी था और हुनर भी, सो उसने डाकुओं से अपना हुनर, अपना साधन मांग लिया। यही हुनर उसके काम आया और डाकुओं ने उसके संगीत से प्रभावित होकर सारा धन भी लौटा दिया। 
जिन्दगी   की  सीख  : आप जब भी परेशानी में घिरें तो अपने स्वभाव और अपने हुनर पर भरोसा रखें, उसी को बचाएं, अगर हुनर बचा रहा तो धन-दौलत फिर मिल जाएंगे।

बुद्धि से बड़ा बल भी नहीं

एक गुफा में एक बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।
फिर एक प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता है।’
शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’
सभी जानवरों में निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हर दिन समय पर आपकी सेवा से पहुँच जाया करेगा।’
शेर ने कुछ देर सोचा और कहा- ‘यदि तुम लोग ऐसा ही चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी चाहिए।’
इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता था। एक दिन शेर के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था। उसने मन-ही मन सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करुँ? ऐसा सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा। इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर हो गई।’
खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हुई?’
खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’
मैंने उससे कहा- ‘यदि तुमने मुझे मार दिया तो हमारे राजा तुम पर नाराज होंगे और तुम्हारे प्राण ले लेंगे।’ उसने पूछा-‘कौन है तुम्हारा राजा?’ इस पर मैंने आपका नाम बता दिया।
यह सुनकर वह शेर क्रोध से भर गया। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर मैंने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’
खरगोश की बात सुनकर दुर्दांत शेर का क्रोध बढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’
खरगोश शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, ‘महाराज, ऐसा लगता है कि आपको देखकर वह शेर अपने किले में घुस गया।’
शेर ने पूछा, ‘कहां है उसका किला?’
खरगोश ने कुएँ को दिखाकर कहा, ‘महाराज, यह है उस शेर का किला’
खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया। दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज, देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। उसके पास आपका शत्रु खड़ा है।’
शेर ने दोनों को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूँज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और वहीं डूबकर मर गया।

जिन्दगी की सीख:बुद्धि से बड़ा बल भी नहीं धेर्य के साथ मुश्किल का सामना करना चाहिए

Wednesday, June 15, 2011

क्षितिज से भी आगे


        लोग उसे  कालू के नाम से पुकारते थे. काला भुजंग शरीर , घनी दादी - मूंछ और  जटा - जूट, उसकी उम्र बीत गयी थी मुर्दों को मरघट मैं पंचतत्व में मिलाते हुए. एक दिन एक महान धर्मगुरु गाँव के बाहर प्रवचन के लिए पधारे. कालू  भी जिज्ञासा वश दर्शन को जा पहुंचा.
           धर्मगुरु प्रदक्षिणा के लिए ज्यों ही चलने को हुए, सामने कालू  आ गया. धर्मगुरु क्रोध से चिल्ला उठे - " दुष्ट! दूर हट जा. रास्ते को अपवित्र न कर. "
          " गुरु महाराज! मेरे चारों और तो पवित्रता फैली है. मैं अपवित्र मरघटिया  कहाँ जाऊं. जहां देखता हूँ वहीं प्रभु की दिव्यता बिखरी है."
धर्म गुरु हटात मौन हो गए और फिर कुछ देर बाद  बोले - " तुमने मेरी  आँखों पर से पर्दा हटा दिया. तुम मरघट वासी हो कर भी दिव्यता देख रहे हो और मैं सारे दिन धर्म और ध्यान में लीन  रहता हूँ फिर भी अपने मन का मैल न धो सका."              
        ज़िन्दगी की सीख : 
                            किसी विषय में कितना भी ज्ञान हो, सदा याद रखें कि  ज्ञान की सीमा क्षितिज से भी आगे है.

किताबी ज्ञान


पुराने जमाने की बात है। एक व्यक्ति अध्ययन करने काशी गया। विभिन्न शास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने में उसे बारह वर्ष लग गए। जब वह लौटा तो घर के लोग काफी प्रसन्न हुए। पत्नी ने उसके स्नान के लिए गर्म पानी तैयार किया। वह उस बर्तन को लेकर स्नान गृह गई। उसने देखा कि वहां हजारों चींटियां हैं। उसने सोचा कि कहीं वे बेचारी बेमौत न मर जाएं, इसलिए उसने गर्म पानी के बर्तन को दूसरे स्थान पर रख दिया। पति आया और बर्तन को उठाकर फिर पहले वाले स्थान पर ले गया और वहीं स्नान करने लगा।
पत्नी ने देखा तो वह परेशान हो गई। उसने कहा, ‘मैंने गर्म पानी का यह बर्तन वहां रखा था, यहां कैसे आ गया?’ पति ने कहा, ‘तुम भी अजीब बात करती हो। स्नान का स्थान यही है। मैं यहीं नहाऊंगा न। मैं ही उस बर्तन को यहां उठा लाया।’ इस पर पत्नी बोली, ‘मैं भी पहले यहीं रखना चाह रही थी, लेकिन यहां चींटियां बहुत हैं।
आपके स्नान के पानी से वे सब मर जाएंगी। इसलिए मैंने इसे दूसरे स्थान पर रखा था।’ पति बोला, ‘यह तो अजीब मूर्खतापूर्ण बात है। क्या मैं चींटियों को जिलाने के लिए ही जनमा हूं? अगर मैं इसी तरह हर किसी की चिंता करता रहा तो जीना मुश्किल हो जाएगा।’ इस बात से पत्नी दुखी हो गई। उसने कहा, ‘बारह वर्ष तक आपने विद्याध्ययन किया। काशी में रहे। लेकिन समझ में नहीं आता कि आपने क्या हासिल किया
सीख..
 ऐसे किताबी ज्ञान से क्या लाभ, जो आपके भीतर संवेदना न पैदा कर सके।किसी प्राणी को अकारण पीड़ा नहीं पहुंचानी चाहिए। ज्ञान का सार तो संवेदनशीलता है। यदि हमारे मन में दूसरों के प्रति सहानुभूति नहीं जागी तो बहुत बड़ा बौद्धिक ज्ञान भी उपयोगी नहीं है।’